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bhagavat 12.8.43: हे प्रभु, ब्रह्मा भी, जो ब्रह्मांड की पूरी अवधि तक अपने ऊंचे पद का आनंद लेते हैं, समय के बीतने से डरते हैं। तो उन बंधे हुए प्राणियों के बारे में क्या कहा जाए जिन्हें ब्रह्मा बनाते हैं? वे अपने जीवन के हर कदम पर भयावह खतरों का सामना करते हैं। मैं इस डर से छुटकारा पाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं जानता सिवाय आपके चरण-कमलों की शरण लेने के, जो खुद मुक्ति का प्रतीक हैं।   |   bhagavat अध्याय 12.8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति   ।   bhagavat स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 8: मार्कण्डेय द्वारा नर-नारायण ऋषि की स्तुति  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  12.8.43 
नान्यं तवाङ्‌घ्र्युपनयादपवर्गमूर्ते:
क्षेमं जनस्य परितोभिय ईश विद्म: ।
ब्रह्मा बिभेत्यलमतो द्विपरार्धधिष्ण्य:
कालस्य ते किमुत तत्कृतभौतिकानाम् ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, ब्रह्मा भी, जो ब्रह्मांड की पूरी अवधि तक अपने ऊंचे पद का आनंद लेते हैं, समय के बीतने से डरते हैं। तो उन बंधे हुए प्राणियों के बारे में क्या कहा जाए जिन्हें ब्रह्मा बनाते हैं? वे अपने जीवन के हर कदम पर भयावह खतरों का सामना करते हैं। मैं इस डर से छुटकारा पाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं जानता सिवाय आपके चरण-कमलों की शरण लेने के, जो खुद मुक्ति का प्रतीक हैं।
 
O Lord, even Brahmā, who enjoys his exalted position for the entire duration of the universe, is afraid of the passage of time. So what about the conditioned souls whom Brahmā creates? They face terrible dangers at every step of their lives. I know of no other means to get rid of this fear except by surrendering to Your lotus feet, which are the very embodiment of salvation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)