श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 6: महाराज परीक्षित का निधन  »  श्लोक 76-77
 
 
श्लोक  12.6.76-77 
सुकर्मा चापि तच्छिष्य: सामवेदतरोर्महान् ।
सहस्रसंहिताभेदं चक्रे साम्नां ततो द्विज ॥ ७६ ॥
हिरण्यनाभ: कौशल्य: पौष्यञ्जिश्च सुकर्मण: ।
शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तम: ॥ ७७ ॥
 
 
अनुवाद
जैमिनि के एक अन्य शिष्य सुकर्मा बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने सामवेद रूपी विशाल वृक्ष को एक हज़ार संहिताओं में बाँट दिया। तब हे ब्राह्मण, सुकर्मा के तीन शिष्यों—कुशल पुत्र हिरण्यनाभ, पौष्यञ्जि और आध्यात्मिक साक्षात्कार में अग्रणी आवन्त्य—ने साम मंत्रों का भार सँभाला।
 
जैमिनि के एक अन्य शिष्य सुकर्मा बहुत बड़े विद्वान थे। उन्होंने सामवेद रूपी विशाल वृक्ष को एक हज़ार संहिताओं में बाँट दिया। तब हे ब्राह्मण, सुकर्मा के तीन शिष्यों—कुशल पुत्र हिरण्यनाभ, पौष्यञ्जि और आध्यात्मिक साक्षात्कार में अग्रणी आवन्त्य—ने साम मंत्रों का भार सँभाला।
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