श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 6: महाराज परीक्षित का निधन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.6.27 
तस्मात् सत्रमिदं राजन् संस्थीयेताभिचारिकम् ।
सर्पा अनागसो दग्धा जनैर्दिष्टं हि भुज्यते ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए हे राजन, इस यज्ञ को बन्द करो, यह यज्ञ अन्यों को हानि पहुँचाने की मंशा से शुरू किया गया है। बहुत से निर्दोष सर्प पहले ही जला कर मार दिये गये हैं। वास्तव में, सभी व्यक्तियों को अपने पिछले कर्मों के अनपेक्षित परिणामों को भोगना ही पड़ता है।
 
इसलिए हे राजन, इस यज्ञ को बन्द करो, यह यज्ञ अन्यों को हानि पहुँचाने की मंशा से शुरू किया गया है। बहुत से निर्दोष सर्प पहले ही जला कर मार दिये गये हैं। वास्तव में, सभी व्यक्तियों को अपने पिछले कर्मों के अनपेक्षित परिणामों को भोगना ही पड़ता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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