| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग » अध्याय 6: महाराज परीक्षित का निधन » श्लोक 25 |
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| | | | श्लोक 12.6.25  | जीवितं मरणं जन्तोर्गति: स्वेनैव कर्मणा ।
राजंस्ततोऽन्यो नास्त्यस्य प्रदाता सुखदु:खयो: ॥ २५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | देहधारी आत्मा का जीवन, मरना और दूसरे जन्म में उसका गंतव्य- ये सभी उसके अपने कर्मों से ही निर्धारित होते हैं। इसलिए हे राजन, किसी के सुख और दुःख के लिए कोई दूसरा व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता है। | | | | देहधारी आत्मा का जीवन, मरना और दूसरे जन्म में उसका गंतव्य- ये सभी उसके अपने कर्मों से ही निर्धारित होते हैं। इसलिए हे राजन, किसी के सुख और दुःख के लिए कोई दूसरा व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता है। | | ✨ ai-generated | | |
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