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श्लोक 12.6.18  |
अपश्यंस्तक्षकं तत्र राजा पारीक्षितो द्विजान् ।
उवाच तक्षक: कस्मान्न दह्येतोरगाधम: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब राजा जनमेजय ने तक्षक को यज्ञ की आग में प्रवेश करते नहीं देखा, तब ब्राह्मणों से बोले “सबसे नीच सर्पों में सबसे नीच तक्षक इस आग में क्यों नहीं जल रहा?” |
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| जब राजा जनमेजय ने तक्षक को यज्ञ की आग में प्रवेश करते नहीं देखा, तब ब्राह्मणों से बोले “सबसे नीच सर्पों में सबसे नीच तक्षक इस आग में क्यों नहीं जल रहा?” |
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