श्रीशुक उवाच
अत्रानुवर्ण्यतेऽभीक्ष्णं विश्वात्मा भगवान् हरि: ।
यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्र: क्रोधसमुद्भव: ॥ १ ॥
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: इस श्रीमद्भागवत में भगवान हरि का विस्तार से वर्णन किया गया है जो सभी प्राणियों की आत्मा हैं। जब वो प्रसन्न होते हैं तो ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं और जब वो क्रोधित होते हैं तो रुद्र का जन्म होता है।
Sukadeva Goswami said: In the various stories of this Srimad Bhagavatam, Lord Hari has been described in detail, when He is pleased, Lord Brahma is born and when His anger results in the birth of Rudra.
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने इस श्लोक पर अपनी व्याख्या में श्रीमद्-भागवतम का बहुत विस्तृत सारांश दिया है। महान आचार्य के कथन का सार यह है कि श्रीमद्-भागवतम में वर्णित अनुसार सर्वोच्च भगवान, कृष्ण के लिए बिना शर्त प्यार भरा समर्पण जीवन की सबसे बड़ी पूर्णता है। श्रीमद्-भागवतम का एकमात्र उद्देश्य सशर्त आत्मा को भगवान के लिए समर्पण करने और घर वापस, भगवान के पास जाने के लिए प्रेरित करना है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥