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श्लोक 12.4.7  |
पर्जन्य: शतवर्षाणि भूमौ राजन् न वर्षति ।
तदा निरन्ने ह्यन्योन्यं भक्ष्यमाणा: क्षुधार्दिता: ।
क्षयं यास्यन्ति शनकै: कालेनोपद्रुता: प्रजा: ॥ ७ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजा, जैसे-जैसे प्रलय नजदीक आती जाएगी, वैसे-वैसे पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी। सूखे के कारण अकाल पड़ जाएगा और भूख से मरने वाली जनता सचमुच में एक-दूसरे को खा जाएगी। पृथ्वी के निवासी समय की शक्ति से विचलित होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाएँगे। |
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| हे राजा, जैसे-जैसे प्रलय नजदीक आती जाएगी, वैसे-वैसे पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी। सूखे के कारण अकाल पड़ जाएगा और भूख से मरने वाली जनता सचमुच में एक-दूसरे को खा जाएगी। पृथ्वी के निवासी समय की शक्ति से विचलित होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाएँगे। |
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