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श्लोक 12.4.30  |
न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।
नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वातयोरिव ॥ ३० ॥ |
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| अनुवाद |
| परम सत्य में कोई भौतिक द्वैत नहीं है। अज्ञानतावश व्यक्ति को दिखने वाला विभेद, खाली बर्तन के भीतर और बर्तन से बाहर के आकाश के भेद जैसा ही है या फिर पानी में सूर्य की प्रतिबिम्ब और आकाश में सूर्य का भेद जैसा है, या फिर एक शरीर में हो रही जीवनी शक्ति और दूसरे शरीर की जीवनी शक्ति के बीच का भेद जैसा है। |
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| परम सत्य में कोई भौतिक द्वैत नहीं है। अज्ञानतावश व्यक्ति को दिखने वाला विभेद, खाली बर्तन के भीतर और बर्तन से बाहर के आकाश के भेद जैसा ही है या फिर पानी में सूर्य की प्रतिबिम्ब और आकाश में सूर्य का भेद जैसा है, या फिर एक शरीर में हो रही जीवनी शक्ति और दूसरे शरीर की जीवनी शक्ति के बीच का भेद जैसा है। |
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