श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग  »  अध्याय 4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.4.27 
सत्यं ह्यवयव: प्रोक्त: सर्वावयविनामिह ।
विनार्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तव: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा, (वेदान्त-सूत्र में) यह कहा गया है कि इस ब्रह्माण्ड में किसी भी प्रकट पदार्थ को बनाने वाला अवयवी कारण, पृथक सत्ता के रूप में, उसी तरह देखा जा सकता है, जिस प्रकार कपड़े को बनाने वाले धागे उनसे बनी वस्तु (कपड़ा) से अलग देखे जा सकते हैं।
 
हे राजा, (वेदान्त-सूत्र में) यह कहा गया है कि इस ब्रह्माण्ड में किसी भी प्रकट पदार्थ को बनाने वाला अवयवी कारण, पृथक सत्ता के रूप में, उसी तरह देखा जा सकता है, जिस प्रकार कपड़े को बनाने वाले धागे उनसे बनी वस्तु (कपड़ा) से अलग देखे जा सकते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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