| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 12: पतनोन्मुख युग » अध्याय 4: ब्रह्माण्ड के प्रलय की चार कोटियाँ » श्लोक 25 |
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| | | | श्लोक 12.4.25  | बुद्धेर्जागरणं स्वप्न: सुषुप्तिरिति चोच्यते ।
मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | बुद्धि की तीन स्थितियाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति कहलाती हैं। पर हे राजन, शुद्ध जीव के लिए इन विभिन्न अवस्थाओं से उत्पन्न नाना प्रकार के अनुभव माया के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। | | | | बुद्धि की तीन स्थितियाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति कहलाती हैं। पर हे राजन, शुद्ध जीव के लिए इन विभिन्न अवस्थाओं से उत्पन्न नाना प्रकार के अनुभव माया के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। | | ✨ ai-generated | | |
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