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श्लोक 11.8.34  |
विदेहानां पुरे ह्यस्मिन्नहमेकैव मूढधी: ।
यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात् काममच्युतात् ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस विदेह नगरी में सचमुच मैं ही पक्की मूर्ख हूं। मैंने उस भगवान की अवहेलना की है जो हमें सबकुछ देता है, यहां तक की हमारा मूल आध्यात्मिक स्वरूप भी। मैंने उन्हें छोड़कर कई पुरुषों से इंद्रियों की तृप्ति का भोग करना चाहा। |
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| इस विदेह नगरी में सचमुच मैं ही पक्की मूर्ख हूं। मैंने उस भगवान की अवहेलना की है जो हमें सबकुछ देता है, यहां तक की हमारा मूल आध्यात्मिक स्वरूप भी। मैंने उन्हें छोड़कर कई पुरुषों से इंद्रियों की तृप्ति का भोग करना चाहा। |
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