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श्लोक 11.8.2  |
ग्रासं सुमृष्टं विरसं महान्तं स्तोकमेव वा ।
यदृच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोऽक्रिय: ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| अजगर के उदाहरण का अनुसरण करते हुए मनुष्य को भौतिक प्रयासों का परित्याग कर देना चाहिये और अपने खान-पान के लिए उस भोजन को स्वीकार करना चाहिये जो बिना किसी प्रयास के मिल जाय चाहे वह स्वादिष्ट हो या नहीं, पर्याप्त हो या कम। |
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| अजगर के उदाहरण का अनुसरण करते हुए मनुष्य को भौतिक प्रयासों का परित्याग कर देना चाहिये और अपने खान-पान के लिए उस भोजन को स्वीकार करना चाहिये जो बिना किसी प्रयास के मिल जाय चाहे वह स्वादिष्ट हो या नहीं, पर्याप्त हो या कम। |
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