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श्लोक 11.8.19  |
जिह्वयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहित: ।
मृत्युमृच्छत्यसद्बुद्धिर्मीनस्तु बडिशैर्यथा ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| जिस तरह जीभ का भोग करने की इच्छा से प्रेरित मछली मछुआरे के काँटे में फँस कर मारी जाती है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीभ की अत्यधिक उद्वेलित करने वाली उमंगों से मोहग्रस्त होकर विनष्ट हो जाता है। |
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| जिस तरह जीभ का भोग करने की इच्छा से प्रेरित मछली मछुआरे के काँटे में फँस कर मारी जाती है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीभ की अत्यधिक उद्वेलित करने वाली उमंगों से मोहग्रस्त होकर विनष्ट हो जाता है। |
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