श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  11.6.50 
श्रीशुक उवाच
एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुत: ।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत ॥ ५० ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, ऐसे संबोधित किए जाने पर, देवकी के बालक कृष्ण ने अपने प्रिय, अनन्य भक्त उद्धव को गुप्त रूप से उत्तर देना शुरू किया।
 
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, ऐसे संबोधित किए जाने पर, देवकी के बालक कृष्ण ने अपने प्रिय, अनन्य भक्त उद्धव को गुप्त रूप से उत्तर देना शुरू किया।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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