श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  11.6.37-38 
वयं च तस्मिन्नाप्लुत्य तर्पयित्वा पितृन् सुरान् ।
भोजयित्वोषिजो विप्रान् नानागुणवतान्धसा ॥ ३७ ॥
तेषु दानानि पात्रेषु श्रद्धयोप्‍त्‍वा महान्ति वै ।
वृजिनानि तरिष्यामो दानैर्नौभिरिवार्णवम् ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
प्रभास क्षेत्र में स्नान कर, वहाँ पितरों और देवताओं को तृप्त करने के लिए यज्ञ कर, पूजनीय ब्राह्मणों को विविध प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खिला वस्त्र, धन आदि पर्याप्त दान देकर इन भयानकों संकटों को निश्चित ही पार कर लेंगे। जैसे कोई मनुष्य उचित नाव पा कर समुद्र को पार कर सकता है।
 
प्रभास क्षेत्र में स्नान कर, वहाँ पितरों और देवताओं को तृप्त करने के लिए यज्ञ कर, पूजनीय ब्राह्मणों को विविध प्रकार के स्वादिष्ट भोजन खिला वस्त्र, धन आदि पर्याप्त दान देकर इन भयानकों संकटों को निश्चित ही पार कर लेंगे। जैसे कोई मनुष्य उचित नाव पा कर समुद्र को पार कर सकता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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