श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.6.18 
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-
भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डै: ।
पत्न्‍यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणै-
र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्य: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप सोलह हजार अति मनोहर राजसी पत्नियों के साथ निवास कर रहे हैं। वो अपनी अत्यन्त लज्जाशील और मुस्कान-भरी नज़रों और सुन्दर चाप-सी भौंहों से आपको अपने उत्कट प्रेम का सन्देश भेजती हैं। किन्तु वे आपके मन और इन्द्रियों को विचलित करने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं।
 
हे प्रभु, आप सोलह हजार अति मनोहर राजसी पत्नियों के साथ निवास कर रहे हैं। वो अपनी अत्यन्त लज्जाशील और मुस्कान-भरी नज़रों और सुन्दर चाप-सी भौंहों से आपको अपने उत्कट प्रेम का सन्देश भेजती हैं। किन्तु वे आपके मन और इन्द्रियों को विचलित करने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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