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श्लोक 11.6.18  |
स्मायावलोकलवदर्शितभावहारि-
भ्रूमण्डलप्रहितसौरतमन्त्रशौण्डै: ।
पत्न्यस्तु षोडशसहस्रमनङ्गबाणै-
र्यस्येन्द्रियं विमथितुं करणैर्न विभ्व्य: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रभु, आप सोलह हजार अति मनोहर राजसी पत्नियों के साथ निवास कर रहे हैं। वो अपनी अत्यन्त लज्जाशील और मुस्कान-भरी नज़रों और सुन्दर चाप-सी भौंहों से आपको अपने उत्कट प्रेम का सन्देश भेजती हैं। किन्तु वे आपके मन और इन्द्रियों को विचलित करने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं। |
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| हे प्रभु, आप सोलह हजार अति मनोहर राजसी पत्नियों के साथ निवास कर रहे हैं। वो अपनी अत्यन्त लज्जाशील और मुस्कान-भरी नज़रों और सुन्दर चाप-सी भौंहों से आपको अपने उत्कट प्रेम का सन्देश भेजती हैं। किन्तु वे आपके मन और इन्द्रियों को विचलित करने में बिल्कुल सक्षम नहीं हैं। |
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