श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 6: यदुवंश का प्रभास गमन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.6.17 
तत्तस्थूषश्च जगतश्च भवानधीशो
यन्माययोत्थगुणविक्रिययोपनीतान् ।
अर्थाञ्जुषन्नपि हृषीकपते न लिप्तो
येऽन्ये स्वत: परिहृतादपि बिभ्यति स्म ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप इस ब्रह्माण्ड के परम निर्माता और सभी चल व अचल जीवों के सर्वोच्च नियंत्रक हैं। आप हृषीकेश हैं, अर्थात सभी इंद्रियों की गतिविधियों के परम नियंत्रक हैं, और इसलिए आप कभी भी भौतिक सृष्टि के भीतर अनंत इंद्रिय-विषयक गतिविधियों के निरीक्षण के दौरान दूषित या उलझे हुए नहीं होते हैं। दूसरी ओर, अन्य मनुष्य, यहां तक कि योगी और दार्शनिक भी उन भौतिक वस्तुओं को याद करके विचलित और भयभीत रहते हैं जिन्हें उन्होंने ज्ञान की तलाश में त्याग दिया था।
 
हे प्रभु, आप इस ब्रह्माण्ड के परम निर्माता और सभी चल व अचल जीवों के सर्वोच्च नियंत्रक हैं। आप हृषीकेश हैं, अर्थात सभी इंद्रियों की गतिविधियों के परम नियंत्रक हैं, और इसलिए आप कभी भी भौतिक सृष्टि के भीतर अनंत इंद्रिय-विषयक गतिविधियों के निरीक्षण के दौरान दूषित या उलझे हुए नहीं होते हैं। दूसरी ओर, अन्य मनुष्य, यहां तक कि योगी और दार्शनिक भी उन भौतिक वस्तुओं को याद करके विचलित और भयभीत रहते हैं जिन्हें उन्होंने ज्ञान की तलाश में त्याग दिया था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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