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श्लोक 11.6.13  |
केतुस्त्रिविक्रमयुतस्त्रिपतत्पताको
यस्ते भयाभयकरोऽसुरदेवचम्वो: ।
स्वर्गाय साधुषु खलेष्वितराय भूमन्
पाद: पुनातु भगवन् भजतामघं न: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे सर्व शक्तिमान! त्रिविक्रम अवतार में, आपने ध्वज-दंड की तरह अपना पैर उठाकर ब्रह्माण्ड के कवच को तोड़ दिया और पवित्र गंगा को तीनों ग्रहों में विजय-ध्वजा की भाँति बहने दिया। आपने अपने चरणकमलों के तीन विशाल पगों से बलि महाराज को उनके विश्वव्यापी राज्य समेत अपने वश में कर लिया। आपके चरणकमल दानवों में आतंक पैदा कर उन्हें नरक में भेजते हैं और आपके भक्तों में निडरता पैदा करके उन्हें स्वर्ग-जीवन की सिद्धि प्रदान करते हैं। हे प्रभु! हम आपकी निष्ठापूर्वक पूजा करना चाहते हैं, इसलिए आपके चरणकमल कृपा करके हमें हमारे समस्त पापों से मुक्ति दिलाएँ। |
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| हे सर्व शक्तिमान! त्रिविक्रम अवतार में, आपने ध्वज-दंड की तरह अपना पैर उठाकर ब्रह्माण्ड के कवच को तोड़ दिया और पवित्र गंगा को तीनों ग्रहों में विजय-ध्वजा की भाँति बहने दिया। आपने अपने चरणकमलों के तीन विशाल पगों से बलि महाराज को उनके विश्वव्यापी राज्य समेत अपने वश में कर लिया। आपके चरणकमल दानवों में आतंक पैदा कर उन्हें नरक में भेजते हैं और आपके भक्तों में निडरता पैदा करके उन्हें स्वर्ग-जीवन की सिद्धि प्रदान करते हैं। हे प्रभु! हम आपकी निष्ठापूर्वक पूजा करना चाहते हैं, इसलिए आपके चरणकमल कृपा करके हमें हमारे समस्त पापों से मुक्ति दिलाएँ। |
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