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श्लोक 11.5.6  |
कर्मण्यकोविदा: स्तब्धा मूर्खा: पण्डितमानिन: ।
वदन्ति चाटुकान् मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुका: ॥ ६ ॥ |
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| अनुवाद |
| कलाओं से अनभिज्ञ, वेदों के मीठे शब्दों से मोहित और प्रेरित ऐसे उद्दंड अहंकारी मूर्ख अपने को विद्वान होने का दिखावा करते हैं और देवताओं की चापलूसी करते हैं। |
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| कलाओं से अनभिज्ञ, वेदों के मीठे शब्दों से मोहित और प्रेरित ऐसे उद्दंड अहंकारी मूर्ख अपने को विद्वान होने का दिखावा करते हैं और देवताओं की चापलूसी करते हैं। |
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