श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  11.5.37 
न ह्यत: परमो लाभो देहिनां भ्राम्यतामिह ।
यतो विन्देत परमां शान्तिं नश्यति संसृति: ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
सचमुच, भौतिक दुनिया में इधर-उधर भटकने को विवश किए गए देहधारी प्राणियों के लिए भगवान के संकीर्तन आंदोलन से बढ़कर कोई संभावित लाभ नहीं है, जिसके द्वारा वे परम शांति प्राप्त कर सकते हैं और अपने को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकते हैं।
 
सचमुच, भौतिक दुनिया में इधर-उधर भटकने को विवश किए गए देहधारी प्राणियों के लिए भगवान के संकीर्तन आंदोलन से बढ़कर कोई संभावित लाभ नहीं है, जिसके द्वारा वे परम शांति प्राप्त कर सकते हैं और अपने को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर सकते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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