श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 5: नारद द्वारा वसुदेव को दी गई शिक्षाओं का समापन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  11.5.18 
हित्वात्ममायारचिता गृहापत्यसुहृत्स्त्रिय: ।
तमो विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्‍मुखा: ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
जिन लोगों ने भगवान् की माया के जाल में आकर भगवान वासुदेव से मुँह मोड़ लिया है, उन्हें अंत में अपने तथाकथित घर, बच्चे, मित्र, पत्नियाँ तथा प्रेमीजनों को छोड़ना पड़ता है, क्योंकि ये सब भगवान की माया से उत्पन्न हुए थे और ऐसे लोग अपनी इच्छा के विरुद्ध ब्रह्मांड के घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
 
जिन लोगों ने भगवान् की माया के जाल में आकर भगवान वासुदेव से मुँह मोड़ लिया है, उन्हें अंत में अपने तथाकथित घर, बच्चे, मित्र, पत्नियाँ तथा प्रेमीजनों को छोड़ना पड़ता है, क्योंकि ये सब भगवान की माया से उत्पन्न हुए थे और ऐसे लोग अपनी इच्छा के विरुद्ध ब्रह्मांड के घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas