श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  11.3.46 
वेदोक्तमेव कुर्वाणो नि:सङ्गोऽर्पितमीश्वरे ।
नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुति: ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
वैदिक ज्ञान के नियमों का पालन करते हुए और उनके अनुसार कर्म करते हुए, एवं कर्मों के फल भगवान् को समर्पित करते हुए मनुष्य कर्म बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। वेदों में वर्णित कर्मफल वैदिक ज्ञान का चरम लक्ष्य नहीं है, बल्कि कर्ता में रुचि उत्पन्न करने के लिए हैं।
 
वैदिक ज्ञान के नियमों का पालन करते हुए और उनके अनुसार कर्म करते हुए, एवं कर्मों के फल भगवान् को समर्पित करते हुए मनुष्य कर्म बंधनों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। वेदों में वर्णित कर्मफल वैदिक ज्ञान का चरम लक्ष्य नहीं है, बल्कि कर्ता में रुचि उत्पन्न करने के लिए हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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