| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास » अध्याय 3: माया से मुक्ति » श्लोक 17 |
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| | | | श्लोक 11.3.17  | श्रीराजोवाच
यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि: ।
तरन्त्यञ्ज: स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १७ ॥ | | | | | | अनुवाद | | राजा निमि बोले, अत: हे महान ऋषे! कृपया यह बताएँ कि किस प्रकार एक मूढ़ मनुष्य भी भगवान् की उस माया को सरलता से पार कर सकता है, जो उन लोगों के लिए सदैव दुर्लंघ्य है जिन्हें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं होता। | | | | राजा निमि बोले, अत: हे महान ऋषे! कृपया यह बताएँ कि किस प्रकार एक मूढ़ मनुष्य भी भगवान् की उस माया को सरलता से पार कर सकता है, जो उन लोगों के लिए सदैव दुर्लंघ्य है जिन्हें अपने ऊपर नियंत्रण नहीं होता। | | ✨ ai-generated | | |
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