श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 3: माया से मुक्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.3.10 
पातालतलमारभ्य सङ्कर्षणमुखानल: ।
दहन्नूर्ध्वशिखो विष्वग्वर्धते वायुनेरित: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
यह अग्नि भगवान संकर्षण जी के मुंह से निकलती है और पाताल लोक से आरंभ करके बढ़ती जाती है। इसके शोले प्रबल वायु से प्रेरित होकर ऊपर उठते हुए चारों दिशाओं की हर वस्तु को झुलसा देते हैं।
 
यह अग्नि भगवान संकर्षण जी के मुंह से निकलती है और पाताल लोक से आरंभ करके बढ़ती जाती है। इसके शोले प्रबल वायु से प्रेरित होकर ऊपर उठते हुए चारों दिशाओं की हर वस्तु को झुलसा देते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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