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श्लोक 11.26.7  |
ऐल उवाच
अहो मे मोहविस्तार: कामकश्मलचेतस: ।
देव्या गृहीतकण्ठस्य नायु:खण्डा इमे स्मृता: ॥ ७ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा ऐल बोले : अरे! मेरी मोह-माया का जाल देखो! यह देवी मेरे गले लिपटती थी और मेरी गर्दन को अपनी मुट्ठी में जकड़े रहती थी। मेरा मन काम-वासना से इतना दूषित था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा जीवन किस प्रकार व्यतीत हो रहा है। |
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| राजा ऐल बोले : अरे! मेरी मोह-माया का जाल देखो! यह देवी मेरे गले लिपटती थी और मेरी गर्दन को अपनी मुट्ठी में जकड़े रहती थी। मेरा मन काम-वासना से इतना दूषित था कि मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मेरा जीवन किस प्रकार व्यतीत हो रहा है। |
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