श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.26.35 
वैतसेनस्ततोऽप्येवमुर्वश्या लोकनिष्पृह: ।
मुक्तसङ्गो महीमेतामात्मारामश्चचार ह ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
इस तरह उर्वशी के लोक में रहने की अपनी इच्छा को त्यागकर महाराज पुरूरवा ने भौतिक चीजों से मुक्ति पा ली और खुद के भीतर ही संतुष्ट होकर पृथ्वी पर घूमने लगे।
 
इस तरह उर्वशी के लोक में रहने की अपनी इच्छा को त्यागकर महाराज पुरूरवा ने भौतिक चीजों से मुक्ति पा ली और खुद के भीतर ही संतुष्ट होकर पृथ्वी पर घूमने लगे।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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