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श्लोक 11.26.13  |
स्वार्थस्याकोविदं धिङ् मां मूर्खं पण्डितमानिनम् ।
योऽहमीश्वरतां प्राप्य स्त्रीभिर्गोखरवज्जित: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| मुझे धिक्कार है! मैं इतना बड़ा मूर्ख हूँ कि मैंने यह भी नहीं जाना कि मेरे लिए क्या अच्छा है। मैंने तो घमंड से यह सोचा था कि मैं अत्यधिक बुद्धिमान हूँ। यद्यपि मुझे स्वामी का ऊँचा पद प्राप्त हो गया, किन्तु मैं स्त्रियों से अपने को परास्त करवाता रहा मानो मैं कोई बैल या गधा होऊँ। |
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| मुझे धिक्कार है! मैं इतना बड़ा मूर्ख हूँ कि मैंने यह भी नहीं जाना कि मेरे लिए क्या अच्छा है। मैंने तो घमंड से यह सोचा था कि मैं अत्यधिक बुद्धिमान हूँ। यद्यपि मुझे स्वामी का ऊँचा पद प्राप्त हो गया, किन्तु मैं स्त्रियों से अपने को परास्त करवाता रहा मानो मैं कोई बैल या गधा होऊँ। |
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