श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 26: ऐल-गीत  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  11.26.10 
सपरिच्छदमात्मानं हित्वा तृणमिवेश्वरम् ।
यान्तीं स्‍त्रियं चान्वगमं नग्न उन्मत्तवद् रुदन् ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि मैं प्रचुर ऐश्वर्य से युक्त शक्तिशाली नरेश था, किन्तु उसने मुझे ऐसे त्याग दिया मानो मैं कोई घास का मामूली पत्ता हूँ। फिर भी, मैं नग्न और बिना शर्म के, एक पागल व्यक्ति की तरह रोता-चिल्लाता उसके पीछे-पीछे भटकता रहा।
 
यद्यपि मैं प्रचुर ऐश्वर्य से युक्त शक्तिशाली नरेश था, किन्तु उसने मुझे ऐसे त्याग दिया मानो मैं कोई घास का मामूली पत्ता हूँ। फिर भी, मैं नग्न और बिना शर्म के, एक पागल व्यक्ति की तरह रोता-चिल्लाता उसके पीछे-पीछे भटकता रहा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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