श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  11.25.36 
जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्चाशयसम्भवै: ।
मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्चरेत् ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
मन की सूक्ष्म बद्धता से और भौतिक चेतना से उत्पन्न प्रकृति की वृत्तियों से मुक्त होते हुए प्राणी मेरे दिव्य रूप का अनुभव करके पूर्ण रूप से तृप्त हो जाता है। अब वह बाहरी ऊर्जा में सुख नहीं खोजता और न ही अपने मन में ऐसे आनंद का चिंतन या स्मरण करता है।
 
मन की सूक्ष्म बद्धता से और भौतिक चेतना से उत्पन्न प्रकृति की वृत्तियों से मुक्त होते हुए प्राणी मेरे दिव्य रूप का अनुभव करके पूर्ण रूप से तृप्त हो जाता है। अब वह बाहरी ऊर्जा में सुख नहीं खोजता और न ही अपने मन में ऐसे आनंद का चिंतन या स्मरण करता है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas