श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  11.25.35 
सत्त्वं चाभिजयेद् युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधी: ।
सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीवं विहाय माम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए, भक्ति में स्थिर होकर साधक को चाहिए कि गुणों के प्रति उपेक्षा भाव रखते हुए सत्व गुण पर विजय प्राप्त कर ले। इस तरह अपने मन में शांत और प्रकृति के गुणों से मुक्त आत्मा अपने बद्ध जीवन के मूल कारण का त्याग कर देती है और मुझे प्राप्त कर लेती है।
 
इसलिए, भक्ति में स्थिर होकर साधक को चाहिए कि गुणों के प्रति उपेक्षा भाव रखते हुए सत्व गुण पर विजय प्राप्त कर ले। इस तरह अपने मन में शांत और प्रकृति के गुणों से मुक्त आत्मा अपने बद्ध जीवन के मूल कारण का त्याग कर देती है और मुझे प्राप्त कर लेती है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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