श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  11.25.33 
तस्माद् देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम् ।
गुणसङ्गं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणा: ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
इसलिए मनुष्य के इस जीवन को प्राप्त करके, जो पूर्ण ज्ञान विकसित करने की छूट देता है, बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे अपने को प्रकृति के गुणों के सारे कल्मष से मुक्त कर लें और एकमात्र मेरी भक्ति में लग जायें।
 
इसलिए मनुष्य के इस जीवन को प्राप्त करके, जो पूर्ण ज्ञान विकसित करने की छूट देता है, बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे अपने को प्रकृति के गुणों के सारे कल्मष से मुक्त कर लें और एकमात्र मेरी भक्ति में लग जायें।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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