श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  11.25.32 
एता: संसृतय: पुंसो गुणकर्मनिबन्धना: ।
येनेमे निर्जिता: सौम्य गुणा जीवेन चित्तजा: ।
भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भ‍ावाय प्रपद्यते ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
हे सौम्य उद्धव, बद्ध जीवन की ये विभिन्न अवस्थाएँ प्रकृति के गुणों से पैदा हुए कर्म से उत्पन्न होती हैं। जो जीव इन गुणों को, जो मन से प्रकट होते हैं, जीत लेता है, वह भक्ति मार्ग से अपने आपको मुझे समर्पित कर देता है और इस तरह मेरे प्रति शुद्ध प्रेम प्राप्त करता है।
 
हे सौम्य उद्धव, बद्ध जीवन की ये विभिन्न अवस्थाएँ प्रकृति के गुणों से पैदा हुए कर्म से उत्पन्न होती हैं। जो जीव इन गुणों को, जो मन से प्रकट होते हैं, जीत लेता है, वह भक्ति मार्ग से अपने आपको मुझे समर्पित कर देता है और इस तरह मेरे प्रति शुद्ध प्रेम प्राप्त करता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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