श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  11.25.29 
सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम् ।
तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम् ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
आत्म-सिद्ध सुख सात्विक है, इंद्रिय-सुख राजसिक है और भ्रम एवं अधोगति पर आधारित सुख तामसिक है। परंतु मेरे भीतर पाया जाने वाला सुख पारलौकिक है।
 
आत्म-सिद्ध सुख सात्विक है, इंद्रिय-सुख राजसिक है और भ्रम एवं अधोगति पर आधारित सुख तामसिक है। परंतु मेरे भीतर पाया जाने वाला सुख पारलौकिक है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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