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श्लोक 11.25.27  |
सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मश्रद्धा तु राजसी ।
तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य के लिए केंद्रित श्रद्धा सात्विक है, सार्थक कार्य से प्रेरित श्रद्धा राजसिक है और अधार्मिक कार्यों में निवास करने वाली श्रद्धा तामसिक है परन्तु मेरी भक्ति में की जाने वाली श्रद्धा पूर्ण रूप से दिव्य है। |
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| आध्यात्मिक जीवन के लक्ष्य के लिए केंद्रित श्रद्धा सात्विक है, सार्थक कार्य से प्रेरित श्रद्धा राजसिक है और अधार्मिक कार्यों में निवास करने वाली श्रद्धा तामसिक है परन्तु मेरी भक्ति में की जाने वाली श्रद्धा पूर्ण रूप से दिव्य है। |
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