| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास » अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे » श्लोक 26 |
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| | | | श्लोक 11.25.26  | सात्त्विक: कारकोऽसङ्गी रागान्धो राजस: स्मृत: ।
तामस: स्मृतिविभ्रष्टो निर्गुणो मदपाश्रय: ॥ २६ ॥ | | | | | | अनुवाद | | जो कर्ता आसक्ति से रहित है, वह सतोगुणी होता है; निजी इच्छाओं द्वारा अंधा हुआ कर्ता रजोगुणी तथा अच्छे और बुरे में अंतर करना भूल जाने वाला कर्ता तमोगुणी होता है। किंतु जिस कर्ता ने मेरी शरण ली हुई है, वह प्रकृति के गुणों से परे माना जाता है। | | | | जो कर्ता आसक्ति से रहित है, वह सतोगुणी होता है; निजी इच्छाओं द्वारा अंधा हुआ कर्ता रजोगुणी तथा अच्छे और बुरे में अंतर करना भूल जाने वाला कर्ता तमोगुणी होता है। किंतु जिस कर्ता ने मेरी शरण ली हुई है, वह प्रकृति के गुणों से परे माना जाता है। | | ✨ ai-generated | | |
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