श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 25: प्रकृति के तीन गुण तथा उनसे परे  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  11.25.17 
विकुर्वन् क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्च चेतसाम् ।
गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतैर्निशामय ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
रजोगुण को इसके लक्षणों से पहचानना चाहिए—अत्यधिक कर्म के कारण बुद्धि का विकार, इंद्रियों का सांसारिक वस्तुओं से मुक्त न हो पाना, कर्मेंद्रियों की अस्वस्थ स्थिति और मन की चंचलता।
 
रजोगुण को इसके लक्षणों से पहचानना चाहिए—अत्यधिक कर्म के कारण बुद्धि का विकार, इंद्रियों का सांसारिक वस्तुओं से मुक्त न हो पाना, कर्मेंद्रियों की अस्वस्थ स्थिति और मन की चंचलता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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