श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 23: अवन्ती ब्राह्मण का गीत  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  11.23.47 
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा
मनश्च नान्यस्य वशं समेति ।
भीष्मो हि देव: सहस: सहीयान्
युञ्ज्याद वशे तं स हि देवदेव: ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
सनातन काल से सभी इंद्रियाँ मन के नियंत्रण में हैं, और मन स्वयं कभी किसी दूसरे के प्रभुत्व में नहीं आता। वह सब शक्तिशालियों से शक्तिशाली है और उसकी ईश्वर जैसी शक्ति भयावह है। इसलिए, जो कोई भी मन को वश में कर सकता है, वह सभी इंद्रियों का स्वामी बन जाता है।
 
All the senses have been under the control of the mind since eternity and the mind never comes under the influence of anyone else. It is stronger than the strongest and its godlike power is terrifying. Therefore, one who can control his mind becomes the master of all the senses.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)