श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 2: नौ योगेन्द्रों से महाराज निमि की भेंट  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  11.2.40 
एवंव्रत: स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै: ।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्य: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
भगवद्-नाम के पवित्र कीर्तन से मनुष्य भगवद्प्रेम की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। तब वह भक्त भगवान् के नित्य दास के रूप में व्रत-पालन में स्थिर हो जाता है और धीरे-धीरे भगवान् के किसी एक नाम और रूप से अत्यधिक अनुरक्त हो जाता है। जब उसका हृदय भाव-भरे प्रेम से द्रवित हो जाता है, तो वह जोर-जोर से हँसता है, रोता है या चिल्लाता है। कभी-कभी वह पागलों की तरह गाता-नाचता भी है, क्योंकि फिर जन-मत की वह परवाह नहीं करता।
 
भगवद्-नाम के पवित्र कीर्तन से मनुष्य भगवद्प्रेम की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। तब वह भक्त भगवान् के नित्य दास के रूप में व्रत-पालन में स्थिर हो जाता है और धीरे-धीरे भगवान् के किसी एक नाम और रूप से अत्यधिक अनुरक्त हो जाता है। जब उसका हृदय भाव-भरे प्रेम से द्रवित हो जाता है, तो वह जोर-जोर से हँसता है, रोता है या चिल्लाता है। कभी-कभी वह पागलों की तरह गाता-नाचता भी है, क्योंकि फिर जन-मत की वह परवाह नहीं करता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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