श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 16: भगवान् की विभूतियाँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  11.16.44 
तस्माद्वचोमन:प्राणान् नियच्छेन्मत्परायण: ।
मद्भ‍‍क्तियुक्तया बुद्ध्या तत: परिसमाप्यते ॥ ४४ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे शरणागत होकर मनुष्य को अपनी वाणी, मन और प्राण पर नियंत्रण रखना चाहिए। उसके बाद, भक्तिमयी बुद्धि के द्वारा वह अपने जीवन के लक्ष्य को पूरी तरह से पूरा कर सकेगा।
 
मेरे शरणागत होकर मनुष्य को अपनी वाणी, मन और प्राण पर नियंत्रण रखना चाहिए। उसके बाद, भक्तिमयी बुद्धि के द्वारा वह अपने जीवन के लक्ष्य को पूरी तरह से पूरा कर सकेगा।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध ग्यारह के अंतर्गत सोलहवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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