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श्लोक 11.16.18  |
उच्चै:श्रवास्तुरङ्गाणां धातूनामस्मि काञ्चनम् ।
यम: संयमतां चाहम् सर्पाणामस्मि वासुकि: ॥ १८ ॥ |
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| अनुवाद |
| घोड़ों में मैं उच्चैश्रवा तथा धातुओं में सोना हूँ। दंड देने वालों तथा दमन करने वालों में मैं यमराज हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ। |
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| घोड़ों में मैं उच्चैश्रवा तथा धातुओं में सोना हूँ। दंड देने वालों तथा दमन करने वालों में मैं यमराज हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ। |
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