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श्लोक 11.15.24  |
पार्ष्ण्यापीड्य गुदं प्राणं हृदुर:कण्ठमूर्धसु ।
आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम् ॥ २४ ॥ |
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| अनुवाद |
| स्वच्छंद-मृत्यु नामक योग-शक्ति से संपन्न योगी गुदा को एड़ी से दबाकर आत्मा को क्रमश: हृदय से उठाकर वक्षस्थल, गर्दन और अंत में सिर तक ले जाता है। फिर ब्रह्मरंध्र में स्थित होकर वह अपना भौतिक शरीर त्यागता हुआ आत्मा को अपने चुने हुए गंतव्य तक ले जाता है। |
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| स्वच्छंद-मृत्यु नामक योग-शक्ति से संपन्न योगी गुदा को एड़ी से दबाकर आत्मा को क्रमश: हृदय से उठाकर वक्षस्थल, गर्दन और अंत में सिर तक ले जाता है। फिर ब्रह्मरंध्र में स्थित होकर वह अपना भौतिक शरीर त्यागता हुआ आत्मा को अपने चुने हुए गंतव्य तक ले जाता है। |
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