श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 15: भगवान् कृष्ण द्वारा योग-सिद्धियों का वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  11.15.21 
मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनुवायुना ।
मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मन: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जो योगी अपना मन मुझमें लीन कर देता है और उसके बाद मन के पीछे चलने वाली वायु का उपयोग भौतिक शरीर को मुझमें लीन करने के लिए करता है, वह मेरे ध्यान की शक्ति से उस योग-सिद्धि को प्राप्त करता है जिससे उसका शरीर तुरन्त ही मन के पीछे-पीछे चलता है जहाँ कहीं भी मन जाता है।
 
जो योगी अपना मन मुझमें लीन कर देता है और उसके बाद मन के पीछे चलने वाली वायु का उपयोग भौतिक शरीर को मुझमें लीन करने के लिए करता है, वह मेरे ध्यान की शक्ति से उस योग-सिद्धि को प्राप्त करता है जिससे उसका शरीर तुरन्त ही मन के पीछे-पीछे चलता है जहाँ कहीं भी मन जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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