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श्लोक 11.13.25  |
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजा: ।
जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मन: ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुत्रो, मन स्वाभाविक रूप से भौतिक इन्द्रियों के विषयों में प्रवेश करने के लिए प्रवृत्त होता है और उसी प्रकार इन्द्रियों के विषय भी मन में प्रवेश करते हैं; परन्तु ये भौतिक मन और इन्द्रियों के विषय मात्र आत्मा को ढकने वाली संज्ञाएँ हैं जो कि मेरा अंश है। |
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| हे पुत्रो, मन स्वाभाविक रूप से भौतिक इन्द्रियों के विषयों में प्रवेश करने के लिए प्रवृत्त होता है और उसी प्रकार इन्द्रियों के विषय भी मन में प्रवेश करते हैं; परन्तु ये भौतिक मन और इन्द्रियों के विषय मात्र आत्मा को ढकने वाली संज्ञाएँ हैं जो कि मेरा अंश है। |
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