श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 11: सामान्य इतिहास  »  अध्याय 10: सकाम कर्म की प्रकृति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  11.10.21 
श्रुतं च द‍ृष्टवद् दुष्टं स्पर्धासूयात्ययव्ययै: ।
बह्वन्तरायकामत्वात् कृषिवच्चापि निष्फलम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जिस भौतिक सुख के बारे में हम सुनते रहते हैं, जैसे स्वर्गलोक में जाकर दैवीय सुख पाना, वह भी हमारे द्वारा पहले से ही अनुभव किये गये भौतिक सुखों के ही समान है। दोनों ही ईर्ष्या, द्वेष, क्षय और मृत्यु से दूषित रहते हैं। इसलिए जिस तरह फसल के रोग, कीट और सूखे जैसी समस्याओं के सामने आने पर फसल उगाना बेकार हो जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी पर या स्वर्गलोक में भी भौतिक सुख हासिल करने का प्रयास अनगिनत बाधाओं के कारण हमेशा निष्फल हो जाता है।
 
The material happiness we hear about (such as reaching heaven for divine pleasure) is similar to the material happiness we experience. Both are tainted by jealousy, hatred, decay and death. So just as growing crops is futile when problems like disease, pests or drought arise, so too the attempt to attain material happiness on earth or in heaven is futile because of many obstacles.
तात्पर्य
इस श्लोक पर श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इस प्रकार टिप्पणी करते हैं। ''सामान्यतः यदि कोई विशेष अवरोध नहीं है तो कृषि संबंधी कार्यो से फल की प्राप्ति हो जाती है। किंतु यदि बीज में दोष हो, या मृदा अत्यंत खारी या ऊसर हो, अथवा सूखा पड़े, महामारी हो या मौसम के बाहर अत्यधिक वर्षा अथवा गर्मी पड़े या पशु-पक्षी या कीटों द्वारा व्यवधान उपस्थित हों तो कृषिकार्य से इच्छित फसल नहीं मिल पाती। ठीक उसी प्रकार जो लोग भौतिक जगत का विश्लेषण करने में दक्ष होते हैं, वे देखते हैं कि वेदों में प्रतिपादित स्वर्गीय स्थितियां मूलतः पृथ्वी पर जीवन से भिन्न नहीं होती। प्रकृतिबद्ध आत्माओं के परस्पर संपर्क से ईर्ष्या तो अवश्य ही होगी, क्योंकि कोई किसी से श्रेष्ठ और कोई हीन सिद्ध होता रहता है। काल की शक्ति से ये स्थितियां उलट-पलट जाती हैं और इसलिए स्वर्गीय लोकों पर भी हिंसा और कपट जीवन में व्यवधान उत्पन्न करते हैं। वास्तव में स्वर्गलोक में ऊपर उठने का प्रयास स्वयं ही समस्याओं और बाधाओं से भरा होता है। इसलिए इसे समझना चाहिए कि भगवान का राज्य वैकुंठ इस संसार में भौतिक प्रकृति के कानूनों द्वारा आरोपित सीमाओं और व्यवधानों से परे है। यदि यह गलत निष्कर्ष निकाला जाए कि ऐसी अपूर्णताएं भगवान के राज्य में भी विद्यमान हैं, तो व्यक्ति भौतिक दूषण से दूषित हो जाएगा।''
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)