कोऽन्वर्थ: सुखयत्येनं कामो वा मृत्युरन्तिके ।
आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव न तुष्टिद: ॥ २० ॥
अनुवाद
मृत्यु अच्छी नहीं है, और चूँकि हर व्यक्ति वैसा ही है जैसे फाँसी के तख्ते पर ले जाने के लिए सज़ा पाया गया हो, तो फिर लोगों को भौतिक चीज़ों या उनके आनंद से मिलने वाले सुख से कौन-सा लाभ हो सकता है?
Death does not feel good, and since every person is like a condemned man being taken to the place of execution, what possible happiness can people get from material things or the satisfaction they provide?
तात्पर्य
दुनिया भर में यही रीति है कि सज़ायाफ्ता व्यक्ति को आखिरी बार उत्तम भोजन कराया जाता है। मगर सज़ायाफ्ता क़ैदी के लिए यह शानदार भोजन, उसकी नजदीक आती मौत का दर्दनाक एहसास होता है, और इसी कारण वो इसका आनंद नहीं उठा सकता। इसी तरह से, कोई भी समझदार व्यक्ति भौतिक जीवन में तृप्त नहीं हो सकता है क्योंकि मौत हमेशा पास ही खड़ी रहती है और कभी भी हमला बोल सकती है। अगर कोई अपने ही लिविंग रूम में बैठकर अपने साथ एक ज़हरीले साँप के रहने का ज्ञान रखता हो और जानता हो कि साँप के जहरीले दांत किसी भी वक़्त उसके शरीर में चुभ सकते हैं तो वो कैसे चैन से टेलीविज़न देख सकता है या कोई किताब पढ़ सकता है? इसी तरह से, कोई भी पागल या बेवकूफ ही भौतिक जीवन में उत्साह या चैन का अनुभव कर सकता है। मृत्यु की अनिवार्यता का ज्ञान व्यक्ति को आत्मिक जीवन में निष्ठावान होने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥