श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  10.89.58 
द्विजात्मजा मे युवयोर्दिद‍ृक्षुणा
मयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये ।
कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्
हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥ ५८ ॥
 
 
अनुवाद
[महाविष्णु ने कहा:] मैंने ब्राह्मणों के पुत्रों को यहाँ इसलिए लाया था क्योंकि मैं तुम दोनों के दर्शन करना चाहता था। तुम मेरे अंश हो, जो धर्म की रक्षा के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुए हो। जैसे ही तुम पृथ्वी के भारस्वरूप असुरों का वध कर चुकते हो तुरंत मेरे पास यहाँ वापस आ जाना।
 
[Mahavishnu said] : I brought the sons of the brahmanas here because I wanted to see you both. You are my parts, who have descended on earth to protect Dharma. As soon as you have killed the demons who are the burden of the earth, you should immediately return here to me.
तात्पर्य
जैसा कि श्रील विष्णुनाथ चक्रवर्ती ने समझाया है, अर्जुन के ज्ञानोपदेश के लिए बोले गए इन शब्दों का गुप्त अर्थ इस प्रकार है: "तुम दोनों, जो अपनी कलाओं (व्यक्तिगत ऊर्जाओं) के साथ अवतरित हुए हो, पृथ्वी पर बोझ बनने वाले राक्षसों का वध करने के बाद कृपया मेरे पास लौट आओ। इन्हें कृपया मुक्ति के लिए यहाँ मेरे पास भेजो।" श्री हरिवंश और श्रीमद-भागवतम के दूसरे स्कन्ध में कहा गया है कि क्रमिक मुक्ति का मार्ग ब्रह्मांड के आठवें आवरण के बाहर, भगवान महा-विष्णु के निवास के मध्यवर्ती स्थान से होकर गुजरता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)