श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  10.89.53 
तस्मिन् महाभोगमनन्तमद्भ‍ुतं
सहस्रमूर्धन्यफणामणिद्युभि: ।
विभ्राजमानं द्विगुणेक्षणोल्बणं
सिताचलाभं शितिकण्ठजिह्वम् ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
उस स्थान पर विशाल और विस्मयकारी अनन्त शेष सर्प था। वह अपने हजारों फनों पर स्थित रत्नों से निकलने वाली चमक से दमक रहा था, जो फनों से दुगुनी भयावह आँखों से परावर्तित हो रही थी। वह सफ़ेद कैलाश पर्वत जैसा लग रहा था और उसकी गर्दनें और जीभें गहरे नीले रंग की थीं।
 
At that place was the huge and awesome serpent Ananta Shesha. It was glittering with light emanating from the thousands of gems on its hoods, which was reflected from the terrifying eyes that were doubled from the hoods. It looked like the white Mount Kailash and its necks and tongues were dark blue.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)