श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ  »  अध्याय 89: कृष्ण तथा अर्जुन द्वारा ब्राह्मण-पुत्रों का  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  10.89.52 
तत: प्रविष्ट: सलिलं नभस्वता
बलीयसैजद् बृहदूर्मिभूषणम् ।
तत्राद्भ‍ुतं वै भवनं द्युमत्तमं
भ्राजन्मणिस्तम्भसहस्रशोभितम् ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
उस क्षेत्र से उन्होंने जलराशि में प्रवेश किया, जहाँ शक्तिशाली पवन के कारण विशाल लहरें मथी जा रही थी। उस समुद्र के भीतर अर्जुन ने एक अद्भुत महल देखा, जो उसने अभी तक देखी गई किसी भी चीज से अधिक चमकदार था। इसकी सुंदरता हजारों सजावटी स्तंभों से बढ़ गई थी, जो चमकदार रत्नों से सजे हुए थे।
 
From that region they entered a body of water which was aglow with great waves churned by a powerful wind. Within that sea Arjuna saw a wonderful palace, more resplendent than anything he had seen before. Its beauty was enhanced by thousands of ornate pillars studded with sparkling gems.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)