मुक्तं गिरिशमभ्याह भगवान् पुरुषोत्तम: ।
अहो देव महादेव पापोऽयं स्वेन पाप्मना ॥ ३८ ॥
हत: को नु महत्स्वीश जन्तुर्वै कृतकिल्बिष: ।
क्षेमी स्यात् किमु विश्वेशे कृतागस्को जगद्गुरौ ॥ ३९ ॥
अनुवाद
तब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने खतरे से बाहर हुए गिरिश को सम्बोधित किया, "हे महादेव, मेरे प्रभु, देखो, यह दुष्ट व्यक्ति अपने ही पापों के परिणामों से मारा गया है। निस्संदेह, यदि कोई प्राणी महान संतों का अपमान करता है, तो वह सौभाग्य की आशा कैसे कर सकता है? ब्रह्मांड के स्वामी और गुरु के प्रति अपराध करने के मामले में, तो बात ही मत करो।"
Then the Supreme Personality of Godhead addressed Girish, who was out of danger, “O Mahadeva, my Lord, see how this wicked man has been killed by the consequences of his own sins. Indeed, if a living being insults the great saints, how can he hope for good fortune? What can one say about offending the Lord of the universe and the Guru?”
तात्पर्य
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, भगवान विष्णु के इस कथन में हल्की सी डाँट का भाव निहित है: "अरे अनंत दृष्टि वाले, हे स्पष्ट बुद्धि वाले, दुष्ट राक्षसों को इस तरह से वरदान नहीं देने चाहिए। तुम्हारा वध हो सकता था! पर तुमने इस दरिद्र आत्मा को बचाने के लिए अपनी चिंता की और इस बात की उपेक्षा की कि इसका परिणाम तुम्हारे लिए क्या होगा।" इस प्रकार, आचार्य विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, भगवान नारायण की हल्की फटकार भगवान शिव की असाधारण करुणा को उजागर करती है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥