Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 bhagavat 10.88.20: शिवजी ने उससे कहा: हे मित्र, शांत हो जाओ, शांत हो जाओ, जो भी चाहो मुझसे मांगो। मैं तुम्हें वही वर दूंगा। अफसोस! तुमने व्यर्थ ही अपने शरीर को इतना कष्ट पहुंचाया, क्योंकि जो लोग शरण लेने के लिए मेरे पास आते हैं, केवल जल चढ़ाने से ही मैं प्रसन्न हो जाता हूं। | bhagavat अध्याय 10.88: वृकासुर से शिवजी की रक्षा । bhagavat स्कन्ध 10: परम पुरुषार्थ । श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तमाह चाङ्गालमलं वृणीष्व मे
यथाभिकामं वितरामि ते वरम् ।
प्रीयेय तोयेन नृणां प्रपद्यता-
महो त्वयात्मा भृशमर्द्यते वृथा ॥ २० ॥
अनुवाद
शिवजी ने उससे कहा: हे मित्र, शांत हो जाओ, शांत हो जाओ, जो भी चाहो मुझसे मांगो। मैं तुम्हें वही वर दूंगा। अफसोस! तुमने व्यर्थ ही अपने शरीर को इतना कष्ट पहुंचाया, क्योंकि जो लोग शरण लेने के लिए मेरे पास आते हैं, केवल जल चढ़ाने से ही मैं प्रसन्न हो जाता हूं।
Shivji said to him: O friend, enough is enough, ask me for whatever you want. I will grant you that boon. Alas! You have in vain caused so much pain to your body, because I am pleased with the mere offering of water by those who come to me for refuge.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥